माँ का क़र्ज़*

  माँ का क़र्ज़* 
ईश्वर का स्वरूप है माँ, 
जननी है ,ममता का एक रूप है माँ।
माँ की छवि में दिख जाए सारा जहाँ , 
चोट मुझे लगे तो दर्द सहे माँ।
माँ है वो कुम्भकार ,
जो मिट्टी को दे स्वरूप ,आकार ।
अपने ही अंश से मुझको दुनिया में लायी , 
हर पीड़ा , हर दर्द सहा , पर मुझ पर आँच ना आयी ।
आँचल में अपने संभाला है जग को , 
ना हो कोई भी पीड़ा किसी को , 
जब दर्द हो तो आह निकले 
मुँह से सबके माँ निकले।
क़र्ज़ माँ के ना उतार पाएँगे , 
जन्म चाहे कितने भी पाएँगे ।
माँ से कोमल कोई हो नहीं पाएगा , 
रिश्ता ये ऐसा है कि भूला नहीं जाएगा । 
माँ ही है जीवन दाता 
ईश्वर से बढ़कर है माँ का नाता ।
माँ के कारण ही दुनिया में आते है ,
माँ से ही तो हम मानव बन पाए है ।
विश्व में  चाहे कही भी चले जाओगे , 
माँ का स्थान सबसे ऊपर पाओगे । 
ख़ुद के अंश से वंश बढ़ाती , 
माँ ही तो है दुनिया सजाती ।

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